01 Jul
Posted by Tarun as व्यक्तिव, सिनेमा
Tags:व्यक्तिव, सिनेमागड़वाली सिनेमा के २५ साल पूरे होने पर हमने जा पकड़ा, पहाड़ी महिला के संघर्ष की कहानी कहती फिल्म “गौरा” और पहली गढ़वाली फिल्म “जग्वाल” के निर्माता पराशर गौढ़ को, और उनके साथ करी एक लंबी बातचीत। आज से उसी बातचीत का सिलसिला यहाँ शुरू कर रहे हैं।
पिछली पोस्ट के साथ हमने पराशर गौढ़ के साथ बातचीत का ये सिलसिला शुरू किया था, आज इसी बातचीत को थोड़ा और आगे बढ़ाते हैं। अगर आप किन्हीं कारणों से इस बातचीत की शुरूआत नही पढ़ पाये तो यहाँ उसे पढ़ सकते हैं।
तरूणः मैं समझ सकता हूँ उस वक्त आंचलिक फिल्म बनाना बहुत दूरूह रहा होगा आखिर आपने कैसे ये सब किया, कलाकार, गीत संगीत, कहानी, तकनीकी लोग, कैमरा इन सबके लिये लोग जुटाना बड़ा मुश्किल रहा होगा?
पराशर गौढ़ः जग्वाल बनाने में एक नहीं कई अड़चने आई, मैं स्वयं कई बार भयंकर यातनाओं से गुजरा। मेरा मान सम्मान एक बार नहीं बल्कि कई बार दाँव पे लगा। अपने लोगों में खास कर नाटकों से जुडे लोगो के बीच हंसी का पात्र बना। सन् 1972 से सन् 1983 तक का लम्बा सफर लगा इस फिल्म को पूरा करने में।
रंगमंच पर काम करते-करते काफी अनुभव हो चुका था, मै एक अच्छे कलाकर के साथ-साथ अच्छे र्निदेशक के रूप मे भी जाने जना लगा था। तब सोचा नाटक बहुत कर लिये क्यों न गढ़वाली मे कोई फिल्म बनाई जाय। अब तक इस बोली मे कोई फिल्म नही बनी थी। उस दौरान मैंने हिमाँशु जोशी जी, जो साप्ताहिक हिन्दुस्तान में सह सम्पादक थे उनकी कहानी “कगार की आग” पढ़ी, जो मुझे बहुत पसन्द है। इस पर मैं फिल्म बनाने की सोचने लगा लेकिन मैं उन्हे तब जानता नही था। मैंने अपने मित्र राजेन्द्र धस्माना जी से बात की वो मुझे इनके घर नेता जी नगर लेकर गये। बात हुई, राजेन्द्र जी ने उनसे मेरे विचार बताए कि मैं उनकी काहानी पर गढ़वाली में फिल्म बनाना चाह रहा हूँ। पहले तो उन्होंने मुझे उपर से नीचे तक देखा, शायद सोच रहे थे कि ये और फिल्म, खैर बात नही बनी। मैंने घर आकर र्निणय लिया कि स्वयं कहानी लिखूँगा। जुट गया, काफी मेहनत के बाद “जग्वाल” की कहानी पूरी हो गई। कलाकारों के लिये मैने अपने गढ़वाली थियेटर से जुडे लोगों को ही लेने का मन बन लिया था।
जग्वाल को पहले कौधिक के बैनर तले बनाने का कार्य शुरू हुआ था, जिसमे मैं, श्री दयानन्द चंदोला, जगदीश मन्दोलिया व रीना नैथानी ने इसे पूरा करने की सोची। बकायदा देहली में इसका इस बैनर तले मुर्हत भी हुआ लेकिन एक आदमी जगदीश मन्दोलिया के अपने व्यक्तिगत स्वार्थ व महत्वाकांक्षा ने पूरा प्रोजेक्ट खत्म कर दिया। रीना इसमें हिरोइन थी वो उसे न जाने क्या-क्या सब्जबाग दिखाता रहा, अपने सम्मोहन मे फंसाता रहा। बाद में उसने रीना के साथ मिलकर अपना अलग बैनर बना दिया। जब मुझे ये बात का पता चला तो मैं उनसे अलग हो गया और अपना अलग बैनर बन डाला “आंचलिक फिल्मस”।
अब अकेला था, सारे जुगाड़ मुझे ही करने थे, सबसे बडी समस्या फाइनेन्स की थी, हाथ पाँव मारता रहा। इस बीच एक लम्बा अन्तराल आ पडा, लोगों में जो आशा बँधी थी वो धीरे-धीरे धुँधली होने लगी। मुझ पर से उनका विश्वास उठने लगा, मेरे ऊपर फबतियां कसी जाने लगी, मेरा मजाक उड़ाया जाने लगा। इन सबके बावजूद मैंने हिम्मत नही हारी। फिर से लोगों का विश्वास जीता, प्रगति मंथर गति से आगे बढने लगी।
तरूणः अब बात करते हैं पहली गढ़वाली फिल्म जग्वाल की यानि इंतजार, इस कहानी का आयडिया कहाँ से आया? थोड़ा इस फिल्म के बारे में बतायेंगे, फिल्म की शूटिंग से जुड़ा कोई वाकिया।
पराशर गौढ़ः सन् 1982 में एक नया रास्ता मिला, मदन थपलियाल जी जो मेरे बहुत करीबी दोस्त हैं उन्होंने मुझे अपने एक दोस्त से जो डोक्युमेंट्री बनाते थे मिलाया। वो और मैं मुम्बई गये, वो फिल्म से जुडे कुछ नेपाली टीम को जानते थे उनसे मेरी मुलाकात करवाई। गया तो मैं पहाड़ी फिल्म के लिए था पर उन्होंने जग्वाल को हिन्दी में प्रतीक्षा के नाम से बनाने पर जोर डाल दिया। चलते-चलते आशा बर्मन जी से एक गाना भी रिकार्ड करवा दिया और साथ में राकेश पान्डे को हीरो के लिये साइन भी करवा दिया। जब मैं घर आया, सोचा ये मैं क्या कर रहा हूं? हिन्दी फिल्म तो मुझे बनानी ही नही फिर ये सब क्यूं। मैंने अगले दिन उनसे साफ साफ कह दिया अगर आप साथ में गढ़वाली बोली में फिल्म बनाने पर राजी हैं तो आपका स्वागत है वरना आप अपना ओर काम देखिये वो तुरन्त तैयार हो गये। फिर सारा काम किया गया बैनर रजिस्ट्रेशन करवाया, टीम बनाई, इक्वीपमेंट किराये पर लिये, गाने रिकार्ड किये और चला आया। अक्टूबर में पौड़ी में आंचलिक फिल्मस के तले शूटिंग शुरू हो गई, 22 दिन में सब शूटिंग पूरी की।
बड़े उतार चढ़ाव देखने के बाद 3 मई 1983 को देहली के मावलंकार हाल मे फिल्म का पहला शो हुआ जिसे देखने के लिये वहां पर पूरा पहाड़ उमड़ पडा था। उस दिन मेरे स्व पिता जी की बरसी भी थी, जिनको दिवंगत हुये एक साल हो रहा था। मेरी ओर से उनके लिए एक सच्ची श्रद्धांजली भी थी।
तरूणः मैने ये फिल्म बचपन में देखी थी कहानी अब ठीक से कुछ याद नही लेकिन शायद ये भी एक महिला प्रधान कहानी थी, फिल्म की नायिका इंदू का पति बीरू शादी वाले दिन पुजारी से हुए झगड़े की वजह से १० साल के लिये जेल चला जाता है। बीरू के ये कहने के बाद भी कि उसका इंतजार ना करे और छोटे भाई शेरू से शादी कर ले फिर भी इंदू अपने पति का लंबा इंतजार करती है। क्यों ऐसी ही कुछ कहानी थी ना और मुझे ये भी याद है कि ये शायद दूरदर्शन में भी दिखायी गयी थी।
पराशर गौढ़ः आप सही कह रहे हैं, यही था कहानी का ताना बना।
तरूणः जग्वाल के बाद गौरा में भी आपने फिल्म की कहानी का केन्द्र महिला को ही चुना, इसलिये ये जरूर पूछना चाहूँगा कि इसकी कोई खास वजह।
पराशर गौढ़ः जग्वाल और गौरा दोनो फिल्मों की कहानी यदपि नारी की कथा व्यथा के इर्द र्गिद जरूर घुमती है लेकिन दोनो का विषय विलकुल अलग अलग है। जग्वाल में रिश्तों में पिसती इन्दू जो अपनी पति का इन्तजार करती है तो वहीं गौरा एक राजनैतिक व सरकारी तंत्र की घिनौनी चालों में पिसने पर मजबूर लाचार असहाय महिला के साथ होने वाले अत्याचारों की कहानी है। गौरा मेरे पहाड़ की महिला पर होने वाले अत्त्याचारों की प्रतीक है, जिसमें वहां पर पनप रहे राजनैतिक व कानून की मिली भगत, उसकी गरीबी का मजाक उड़ाते हुए उसके साथ अमान्य हरकत कर, उसे मार कर अपनी अपनी रोटियां सेकने का अवसर ढूँढते हैं। महिलायें पहाड़ की रीढ़ है अगर उस रीढ़ पर कोई आघात होता है तो फिर भला पहाड़ कैसे जीवित रह पायेगा।
तरूणः पहाड़ में महिलाओं के कठिन जीवन और परेशानियों के बारे में आपके क्या विचार हैं।
पराशर गौढ़ः पहाड़ की महिलाएं, पहाड़ जैसी जिन्दगी व्यतीत करती हैं असल में उस पहाड़ को आजतक जिंदा रखा है तो इन्होंने ही रखा है। वो तो पैदा होने से और अपने जीवन के आखिरी पड़ाव तक हमेशा संघर्ष करती आई है। हम लोग पुरूष वर्ग तो बाहर आ जाते हैं, पीछे छोड आते उनके कंधों पर अपने मां-बाप का, बच्चों का, खेतों का, यहां तक की जानवरों का बोझ। उसने तो हर पल हर मोड़ पर समझौते किये है। संघर्ष और मजबूरी का तो उसका चोली और दामन का साथ है।
मुझे मेरा अपने नाटक रिहर्सल का वो डायलागॅ याद आ रहा है, जिसमें वो कहती है - “तुम खुशी और खुशहाली की बात करते हो, ठीक कह रहे हो, गांव में अगर पैसे ढूँढों तो हजारो मे मिल जायेगे पर आदमी ढूँढों तो एक भी नही मिलेगा। नौबत यहां तक आ गई है अगर इस गांव में कोई मरता है तो उसे उठाने के लिए चार आदमी नहीं मिलते। वो भी अब हमको ही उठाने पड रहे हैं।”
तरूणः पहली फिल्म आपने आज से २५ साल पहले बनायी थी जब कुछ नही था, ना घर-घर टीवी की पहुँच, ना इंटरनेट, ना मोबाइल या रिंगटोन और ना ही इतने साधन और सुविधा। तब और अब में आप क्या अंतर देखते हैं।
पराशर गौढ़ः समय बदलता है, साथ में हर चीज, यही तो कुदरत का नियम भी है। उस जमाने में ये सब नहीं था तो जाहिर है, हमें उस समय जो उपलब्ध था उस पर ही निर्भर रहना पड़ा था। उस समय बिना स्टूडियो की गति नही थी क्योंकि आउट डोर जाने में बहुत पैसा लगता था, ऊपर से इतना सारा तामझाम इधर से उधर ले जाने में समय और पैसै की बरबादी और जब से डिजिटल आया है तब से ना इतना तामझाम ना स्टूडियो की जरूरत, सब आसान।
तरूणः फिल्मों के बीच इतने लंबे अंतराल की कुछ खास वजह?
पराशर गौढ़ः एक ही सवाल में आप का उत्तर दूँगा, जब आपके अपने ही आप के पाँव की जमीन को काट दें तो फिर आप के पास क्या बचता है? समय की प्रतीक्षा और सही इन्तजार, यही करता रहा मैं।
गौढ़ जी के साथ बातचीत का ये सिलसिला अभी आगे जारी रहेगा, इस बातचीत को आगे बढ़ायेंगे अगली पोस्ट में। अगर आप भी कोई सवाल पराशर गौढ़ जी से पूछना चाहते हैं तो टिप्पणी के मार्फत आप सवाल पूछ सकते हैं और हम आपके इन सवालों को पराशर गौढ़ जी तक पहुँचा देंगे।
26 Jun
Posted by Tarun as व्यक्तिव, सिनेमा
Tags:व्यक्तिव, सिनेमा, उत्तराखंड, गढ़वाल, गढ़वाली, garhwal, garhwali cinema, gaura, interview, jagwal, parashar gaur, uttarakhandगड़वाली सिनेमा के २५ साल पूरे होने पर हमने जा पकड़ा, पहाड़ी महिला के संघर्ष की कहानी कहती फिल्म “गौरा” और पहली गढ़वाली फिल्म “जग्वाल” के निर्माता पराशर गौढ़ को, और उनके साथ करी एक लंबी बातचीत। आज से उसी बातचीत का सिलसिला यहाँ शुरू कर रहे हैं।
“मुश्किल नही है कुछ भी अगर ठान लीजिये” ये लाईनें शायद उन चंद लोगों को देखकर लिखी गयी होगी जिन्होंने तमाम परेशानियों के बावजूद नये रास्ते बनाकर संभावनाओं के नये द्वार खोले। वो लोग जो “अकेले चले थे जानिबे मंजिल मगर” धीरे धीरे लोग साथ आते गये और कारवां बनता गया। गढ़वाली फिल्मों का कारवाँ बनाने वाले ऐसे ही एक शख्स हैं पराशर गौढ़। उनके साथ बातचीत करके हम जानेंगे कुछ ऐसी बातें जो अभी तक शायद उन्हीं तक सीमित हो।
पराशर गौढ़ जी का स्वागत करते हुए शुरू करते हैं बातचीत का ये सिलसिला -
तरूणः पराशरजी, अपने बारे में पहले कुछ बतायें मसलन गढ़वाल में आप कहाँ से बिलोंग करते हैं, आपने अपनी शिक्षा कहाँ से करी।
पराशर गौढ़: मेरा जन्म पौडी गढ़वाल के अन्तर्गत असवाल स्षूं के ग्राम मिरचोड़ा मे सन् 1947 में हुआ। पिता जी जाने माने जोतिषाचार्य थे। लाहौर, शिमला के बाद वो राजधानी देहली मे बस गये थे। मेरी प्रारभिक शिक्षा सूला और रिठोली से 5वी की, उसके बाद 8वीं मडंनेश्वर, जहाँ गढ़वाल का एक प्रसिद्ध मेला खैरालिंग या मंडानेश्वर लगता है वहां से की। मिडल करने के बाद माता श्री ने आगे की पढ़ाई के लिये पापा के पास देहली भेज दिया। पापा ने माता सुन्दरी हायर सेकन्डरी स्कूल में भर्ती करवा दिया।
पढ़ाई अभी शुरू ही हुई थी कि घर पर मुसीबतों का साया शुरू हो गया। बडे भैया राजस्थान पुलिस मे थे उन्होने वहां से नौकरी छोड दी और देहली आ गये। बीच वाले भैया पहले से पापा के साथ थे, कुल मिलाकर हम 4 आदमी हो गये थे, घर का खर्चा बड गया। एक आदमी कामने वाला और 3 खाने वाले। घर की अर्थ व्यवस्था चरमरानी लगी। मेरे सामने एक-दो विकल्प थे या तो मैं पढ़ाई छोड दूं और काम करूँ या फिर दिन में काम और रात को प्राइवेट पढ़ाई करूँ। मैने निर्णय लिया और पापा से कहा कि मैं दिन मे काम करूँगा और रात को प्राइवेट पढ़ाई कर आगे पढ़ूँगा।
इस तरह पहला विघ्न आया मेरी पढ़ाई में, मैंने 10वीं बागपत बडौत से, 12 वीं शम्भू दयाल कालेज गाजियाबाद से व्यक्तिगत पढ़ाई कर के पास किये, बी ए साहिबाबद से किया। जहां 5 बजे सुबह से 10 बजे तक पढ़ाई करता उसके बाद काम पर जाता था। इस प्रकार से मैने जीवन की देहलीज पर पांव रखा।
तरूणः आपके परिवार में और कौन कौन हैं?
पराशर गौढ़: इस समय, मैं अपने 3 पुत्रों, 2 पुत्र बधुओं और मेरी पथदर्शिका मेरी सहचरी, अपनी श्रीमती जी के साथ भारत से दूर कनाडा में पिछले 20-22 सालों से रह रहा हूँ। मेरे दोनों भाई और उनके बच्चे भी यहीं पर आकर बस गये हैं। एक बेटा अभी अव-विवाहित है।
तरूणः कनाडा आप कब मूव हुए, वहाँ आजकल कहाँ रहते हैं।
पराशर गौढ़: मैं यहां सन् 1988-89 में आ गया था, पहला पड़ाव 24 पोर्टिको ड्राइव स्कारबेरो मे हुआ फिर इटोविको और अब ब्राम्पटन मे पिछले 8-10 साल से रह रहा हूँ।
तरूणः सिनेमा और नाट्य की दुनिया में जाने का विचार आपका पहले से ही था क्या, गढ़वाली सिनेमा बल्कि यूँ कहूँ कि उत्तराखंड सिनेमा नाम की कोई चीज भी जब नही थी तब ये गढ़वाली फिल्म बनाने का विचार कैसे आया?
पराशर गौढ़: कला के प्रति रूझान शुरू से था, 10 साल की उम्र में पहली बार स्टेज पर चढ़ा राजा हरीशचन्द्र के बेटे रोहताश के किरदार के रूप में। 8 वीं मे स्कूल के सांस्कृतिक कार्यक्रमों में हमेशा बड़ चढ़कर हिस्सा लेता रहा। देहली में पहाड़ियों की रामलीला जगह जगह हुआ करती थी, मेरे लिये यह रामलीला का स्टेज किसी एन एस डी से कम नही था। मेरे अन्दर का कलाकार इसी स्टेज की देन है।
गढ़वाली में एक शब्द है बाणिक जिसका अर्थ होता है कारण (या बनना या होना)। कहने का मतलब है जब कोई चीज होनी होती है तो उसके इर्द र्गिद वैसा ही वातावरण व धटनायें घटनी शुरू हो जाती हैं। मुझे नौकरी भी मिली तो ऐसे ही परिवेश मे जहां सांस्कृतिक गतिविधियां हुआ करती थीं। अपने अन्दर की कला भावना व लेखक को उजागर करने के लिए तब मेरे पास माहौल भी था और समय भी।
उन दिनो आकाशवाणी देहली से शाम को 6:30 बजे सप्ताह में दो दिन गढवाली में गीत प्रस्तुत होते थे। मेरे एक दोस्त जगदीश ढौंढियाल जो बहुत अच्छा गाते हैं, ने मुझ से कहा कि क्यों ना मैं गीत लिखूं और वो गायें। सो हम में एक प्रकार का पैक्ट बन गया। उन्होंने आडिशन दिया और वो पास हो गये। उन्होंने मेरे द्वारा लिखित पहला गीत “हौ सिया जोगी कैलाश बसी, जागी जाव है बाबा नील कन्ठी गाया”। जिसे लोगों ने बहुत पसन्द किया, बाद मे गीत बहुत लोकप्रिय हुआ। उस दौरान मेरे 20-30 गीत आकाशवाणी से प्रसारित हुए। गीत और कविता मेरे जहन मे बस गई थी। थोड़ा बहुत नाम भी होने लगा था, लोग मुझे कवि, गीतकार के रूप में जानने लगे थे।
जहाँ तक नाटकों का प्रश्न है तब राजधानी में यदा कदा एकाकी नाटकों का मंचन हुआ करता था, उसमें लेडीज रोल आदमी किया करते थे। मेरी उम्र 18-20 की रही होगी, मैं 1960-62 की बात कर रहा हूँ। मैंने मावलंकार हाल रफी मार्ग में बंगोपाद्याय द्वारा लिखित एक नाटक देखा था जो बंगाल के आम आदमी के जनजीवन पर आधरित था। जिसको देख कर मैं इतना प्रभावित हुआ कि मैंने गढ़वाली में “औंसी की रात” नामक नाटक लिख डाला। एक तो नया नया लेखक उपर से नाटक की विधा से अपरिपक्व होने के कारण उसमें 3 लेडीज पात्र डाल दिये, ये जानते हुए भी कि लेडीज कलाकार का मिलन असम्मभव है। अब प्रश्न था संस्था का, पैसों का, कलाकारों का। मैं अपने मित्र दिनेश पहाड़ी, जो नाटको मे थोड़ा बहुत इच्छा रखते थे, से बात की। उन्होंने अपने एक अन्य मित्र कृष्ण चनपुरिया जो मूल रूप से बिहार से थे बात की इस तरह तीनों ने मिलकर एक संस्था बनाई जिसका नाम रखा गया “पुष्पांजली रंगशाला”।
2 फरवरी 1962 को मेरा नाटक “औंसी की रात” आइ आइ एम ए के हाल में लोगों ने टिकट लेकर देखा। पहली बार गढवाली नाटक देहली में कम्यूनिटी हाल से उठकर रंगमंच के सभागार मे आया जिसमें 3 गढवाली लेडीज कलाकारों ने भी किरदार निभाया। मैंने हीरो का रोल अदा किया और लील नेगी ने हिरोइन का। इस तरह से लील नेगी को गढवाली नाटकों की पहली नायिका बनने का श्रेय मिला। इस नाटक करने से हमारे लोग, तब जो गढवाली बोलने में हिचकिचाते थे या यूँ कहिए शर्माते थे, उनमें अपनी बोली के प्रति आदर की भावना जाग उठी। लोग घरों से या कम्यूनिटी हालों से बाहर आकर थियेटर तक आने शुरु हो गये।
“औसी की रात” अपने आप में कई मायनों में मील का पत्थर साबित हुआ, जैसे पहली बार महिलाओं का स्टेज में आना, पहली बार एकाकी से हटकर फुललैंथ प्ले होना और खेला जाना, पहली बार लोगों का घरों से बाहर आकर हाल में पैसों से टिकट खरीदकर देखना। इसके बाद तो हमने पीछे मूड़कर नहीं देखा। दिल्ली मे बसे गढ़वालियों में अपनी एक अलग सी पहचान बन गई। इस संस्था के तत्त्वाधान मे 10-12 नाटक लिखे और खेले गये। बाहर की संस्थाओं से नाटक करने के निमंत्रण आने लगे।
सन् 1962 से 1983 तक मैंने कई नाटक लिखे जिनमें “औसी की रात़”, “ग्वै”, “तिमला का तिमला”, “खतया चोली” के राजधानी और राज्धानी से बाहर 10-15 बार शो किये गये। लगभग 50 से उपर नाटकों में मैंने मेन रोल किया साथ ही कई नाटको का र्निदेशन भी किया। बस यहीं से शुरू होती है गढ़वाली फिल्म की शुरूवात, “उसको बनाने का एक सपना“।
गौढ़ जी के साथ बातचीत का ये सिलसिला अभी आगे जारी रहेगा, इस बातचीत को आगे बढ़ायेंगे अगली पोस्ट में। अगर आप भी कोई सवाल पराशर गौढ़ जी से पूछना चाहते हैं तो टिप्पणी के मार्फत आप सवाल पूछ सकते हैं और हम आपके इन सवालों को पराशर गौढ़ जी तक पहुँचा देंगे।
17 Jun
Posted by Tarun as सिनेमा
Tags:सिनेमा, chandra kanta malasi, garhwali cinema, garhwali film gaura, narendra singh negi, parashar gaur, shrish dobhal, silver jubaliगढ़वाली सिनेमा की रजत जंयती यानि २५ साल पूरे होने पर गढ़वाली सिनेमा के जनक, पहली गढ़वाली फिल्म ‘जग्वाल’ (४ मई १९८३ को प्रदर्शित) की सौगात देने वाले पराशर गौड़ बतौर निर्माता अब लेकर आये हैं फिल्म ‘गौरा’, यह कनाडा में बसे पराशर गौड़ की दूसरी फिल्म है। रविवार ८ जून को रिलीज हुई यह फिल्म आंचलिक फिल्मस् और गैलेक्सी इंटरनेशनल, कनाडा के संयुक्त बैनर तले बनायी गयी है। इस फिल्म के प्रीमियर का उद्घघाटन संस्कृति और पर्यटन मंत्री प्रकाश पंत ने किया।
ये फिल्म एक साधारण पहाड़ी महिला के संघर्ष और कर्ज के बोझ तले दबे उसके परिवार की कहानी है। गौरा की हत्या के बाद से उत्पन हालात राजनीति पर व्याप्त भ्रष्टाचार से भी दो-चार कराते हैं। इस फिल्म का निर्देशन श्रीष डोभाल ने किया है और इस फिल्म की मुख्य नायिका देहरादून निवासी चंद्रकांता मलासी हैं जो इससे पहले छोटे पर्दे की गढ़वाली फिल्म ‘मेरी प्यारी बोई’ में अभिनय कर चुकी हैं।
इसके अलावा अपनी छाप छोड़ने वाली अब तक बनी कुछ अन्य गढ़वाली फिल्म हैं - १९८३ - जग्वाल, १९८४ - कबि सुख-कबि दुःख, १९८६ - घरजवैं (घर जंवाई), १९८७ - कौथिग (इसी साल पहली कुमांऊनी फिल्म ‘मेघा आ’ भी प्रदर्शित हुई), १९९० - रैबार, १९९२ - बंटवारू, १९८६ - बेटी-ब्वारी, २००३ - तेरी सौं, २००६ - चेलि।
इस अवसर पर देहरादून में मनाये गये गढ़वाली सिनेमा के रजत जंयती समारोह में गढ़वाली सिनेमा के जनक पराशर गौढ़ को सम्मानित किया गया। इन्हें गढ़वाली सिनेमा का दादा साहेब फालके कहा जाया तो कोई अतिश्योक्ति नही होगी। इस अवसर पर गढ़वाली सिनेमा के एक और दिग्गज और मधुर आवाज के धनी नरेन्द्र सिंह नेगी भी मौजूद थे। इन दोनों कलाकारों का साथ काफी पुराना है।
05 Jun
Posted by Tarun as इतिहास, कुमाऊँ, पर्यटन
Tags:इतिहास, कुमाऊँ, पर्यटन, burans, flora, glaciers, hill station, hisaalu, kaafal, mini kashmir, mountains, pithoragarh, tourism, uttarakhand, valleyपिछले अंक - भाग १, भाग २
पिथौरागढ़ के मौसम को चार हिस्सों में बाँटा जा सकता है - दिसम्बर से मार्च तक जाडा़, अप्रैल से जून तक गर्मी, जुलाई से सितम्बर तक मानसून यानि बरसात और सितम्बर से नवम्बर जिसे कई जगह पतझड़ भी कहा जाता है। इसी दौरान शुरू होता है गुलाबी जाड़ा। देखा जाय तो ये समय सबसे उत्तम होता है ना ज्यादा गर्म ना ज्यादा ठंड।
आप सोच रहे होंगे कि गरम और ठडां दोनो ज्यादा कैसे हो सकते हैं दरअसल घाटी में बसा होने की वजह से पिथौरागढ़ में अन्य पहाड़ी स्थलों के मुकाबले गर्मियों में थोड़ा ज्यादा गर्म और सर्दियों में थोड़ा ज्यादा ठंड होती है। पिथौरागढ़ जिले के कुछ कस्बों मसलन घाट, झूलाघाट और धारचूला में तो कई बार तापमान ४० सेटीग्रेड तक भी पहुँच जाता है। 
मूलनिवासी और भाषाः यहाँ के मूल निवासी या जनजातियों में मुख्यतया वन रावत और भोटियाँ जातियाँ आती हैं। जहाँ वन रावत जाति का मुख्य पेशा शिकार था वहीं भोटिया भेड़-बकरी पालन और ट्रेडिंग से अपना काम चलाते थे। यहाँ मुख्यतया कुमाँऊनी और हिन्दी भाषा बोली जाती है। कुमाऊँनी में भी अलग-अलग क्षेत्रों में बोली में variations देखने को मिलता है। नेपाल और तिब्बत की सीमाओं से जुड़े इलाकों में उनकी बोली और कुमाऊँनी मिश्रित बोली सुनायी पड़ती है। किसी जमाने में नेपाल से पिथौरागढ़ और पिथौरागढ़ से नेपाल आना-जाना
बहुत ही सुगम था अब तो शायद ऐसा ना हो, यही वजह थी कि पिथौरागढ़ में पहले काफी नेपाली नजर आते थे, खासकर ज्यादातर कुली नेपाली ही होते थे जिन्हें ढोटियाल भी कहते थे।
पर्वत और ग्लेशियर या हिमनदः पिथौरागढ़ जिले में काफी ग्लेशियर या हिमनद हैं, जिनमें खासकर मिलम, नामिक, रलम, पंचुली, शिपू, धौली और काली काफी प्रसिद्ध हैं। कुछ मुख्य हिमालयन पर्वतों में हैं - नन्दादेवी (७४३४ मी), हरदेओल (७१५१ मी), त्रिशुल (७०७४ मी), नन्दाकोट (६८६१ मी), पंचचुली (६४३७ मी), सुलीटॉप (६३०० मी), कालीगंगाधुरा (६२१५ मी), बाबा कैलाश (६१९१) और नागलिंग (६०४१ मी)। हिन्दूओं के एक प्रसिद्ध तीर्थ कैलास मानसरोवर जाने का मार्ग भी पिथौरागढ़ होते हुए जाता है जो कि आजकल चीन में पड़ता है। इनके अलावा भी बहुत सारे ग्लेशियर और पर्वत इस क्षेत्र में पड़ते हैं।
पहाड़ी दर्रेः पुराने जमाने में इन दर्रों का प्रयोग व्यापार आदि के लिये होता था, चीन और तिब्बत की तरफ जाने वाले या उन्हें जोड़ने वाले कुछ दर्रों में लम्पिया धुरा (५५३० मी की ऊँचाई पर), लिपू-लेह पास (५४५० मी) और मंगश्या-धुरा (५६३० मी) हैं।
इनके अलावा सिन्ला और रलम पास भी इसी क्षेत्र में है जो हिमालय के दूसरे हिस्सों को आपस में जोड़ते हैं, और भी कई अन्य दर्रे पिथौरागढ़ जिले में आते हैं। दर्रों के अलावा कई घाटियाँ भी इस क्षेत्र में पड़ती है, सोर घाटी के अलावा नेपाल-पिथौरागढ़ की सीमा पर है काली घाटी, गौरी-गंगा घाटी, रलम घाटी और अन्य कई।
फ्लोरा और फौना: ये क्षेत्र फ्लोरा और फौना यानि आमचाल की भाषा में जंगली फूल-पौधों के लिहाज से भी काफी धनी है। इनमें मुख्य हैं, (जो मैने देखे भी हैं और पहचान भी सकता हूँ) - काफल (KAFAL - Myrica esculenta),
तिमूर (TIMUR - Zanthoxylum armatum ) ब्रहम कमल (BRAHM KAMAL - Saussurea obvallata), किरमोड़ (KIRMOR - Berberis aristata), हिसालू (HISALU - Rubus rotundifolius), बुरांस (BURANS - Rhododendron barbatum), बांझ यानि Oak (Quercus leucotricophora), साल या चीड़ (Pinus roxburghii), देवदार या Cedar (Cedrus deodara) और कंडाली या बिच्छू (इसी को शायद poison Ivy भी कहते हैं)।
इनमें काफल (गहरा लाल रंग का), हिसालू (पीले रंग का) और किरमोड़ (टमाटर वाला लाल रंग) फल हैं और बुरांस फूल। काफल को नमक-तेल में खाने का जो मजा है आह लिखते हुए ही मुहँ में पानी आ रहा है, गरमियों में अगर आप इस तरफ जायें तो बस स्टेशनों में कोई ना कोई इसे बेचता हुआ मिला जाय। हिसालू भी खाने में बड़े ही स्वादिष्ट होता है, मुझे याद है जब हम छोटे थे तो हिसालू, काफल और बुरांस तोड़ने बड़ी दूर दूर जाया करते थे। इसके अलावा मेरे ख्याल से जहाँ तक याद आता है तिमूर वो ही है जिसकी पत्तियों से हम बचपन में Tattoo
बनाते थे। इसकी पत्तियों में एक खास बात ये होती है (बच्चों के लिये) कि इसे हाथ में रखकर अगर दबाया जाय तो आपके हाथ में पत्तियों का आकार बन जाता है वैसे ही जैसे आजकल Tattoo वाले स्टिकर से बच्चे तरह-तरह की आकृति बनाते हैं।
अगले भाग में कुछ प्रसिद्ध और खुबसूरत जगहों के बारे में बतायेंगे, साथ में वहाँ तक कैसे पहुँचा जाय ये बतायेंगे। आलेख में अगर कुछ त्रुटियां हों तो आशा है आप उन्हें सुधारने में मदद करेंगे, इसके अलावा आप भी कुछ बातें पिथौरागढ़ के बारे में बांटना चाहें तो आपका स्वागत है, टिप्पणियों में अपनी बात कह सकते हैं।
01 Jun
Posted by Tarun as गढवाली संगीत, गीत और संगीत, विडियो
Tags:गढवाली संगीत, गीत और संगीत, विडियो, garhwali song, gori mukhuri sajali, master rohit chauhan, meri maaji, popular pahari music, uttarakhand geetआज पहली बार एक ऐसा पहाड़ी गीत सुना और दिखा रहे हैं जिसे गाया भी बच्चे ने है और इसमें डांस भी बच्चों ने ही किया है। ये गीत गाया है मास्टर रोहित चौहान ने अपने एलबम “मेरी मॉजी” के लिये, रोहित की आवाज में दम है और ये गीत उनकी आवाज में मधुर ही लगता है। मास्टर रोहित का एक दूसरा एलबम “मेरी भनुली” नाम से भी रीलिज हो चुका है। दोनों एलबमों को सुनकर ये ही लगता है कि आने वाले समय में मास्टर रोहित चौहान के और गाने सुनने को जरूर मिलेंगे।
इस गीत में मुख्य कलाकार है सिद्धांत सुजवाल और श्रद्धा वर्मा, जाहिर है विडियो देखकर लग ही रहा है कि सारे कलाकार बच्चे ही हैं।
अब थोड़ा गीत का सारांश भी बता देता हूँ, ये गीत लड़की के गोरे चेहरे की तारीफ में है, लड़की की नाक में लगी नथुली (think as a nose pin but the very big one ;)) और गोरे गाल पर दिखायी देने वाले काले तिल को देखकर लड़के को दिल संभालना भारी पढ़ रहा है। वैसे देखा जाये तो गीत उम्र के हिसाब से काफी आगे की सोच वाला है लेकिन हो सकता है २१वीं सदी की सोच वहीं से शुरू होती हो जहाँ हमारी यानि बीसवीं सदी वालों की खत्म।
ये अलग बात है कि अब गीतों के भाव भी बदल रहे हैं जहाँ पहले के गीतों में पहाड़ की एक छाप दिखायी देती थी वो आजकल के आने वाले गीतों में खोती जा रही है। लेकिन ये बदलते वक्त का तकाजा है इसलिये शायद यही बेहतर होगा कि हम भी अपने को बदलते वक्त के अनुरूप ढालते जायें।
गीत सुनना चाहें तो गीत सुनिये वरना डबल मजा लेने के लिये देखिये विडियो जिसमें बच्चों ने बहुत अच्छा डांस तो किया ही है और ये सब लग भी बढ़े अच्छे रहे हैं।
(सुनने के लिये प्ले के साईन पर डबल क्लिक कीजिये)
विडियो:
डिस्क्लेमर:उत्तरांचल में पोस्ट होने और बजने वाले गीत सिर्फ कुमाँऊ और गढवाल के संगीत को बढावा देने के लिये विज्ञापन मात्र ही हैं, ये कहीं से भी असली सीडी और कैसेट का विकल्प नही है। पसंद आने पर कृप्या असली कैसेट और सीडी ही खरीदें।
, धन्यवाद।
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